सुचित्रा सेन
जन्म: 6 अप्रैल 1931, पबना, बांग्लादेश
मृत्यु: 17 जनवरी 2014, कोलकाता
सुचित्रा का जन्म आज के बांग्लादेश के पाब्ना जिले में 1931 में हुआ था। इन्होंने 1952 में पहली फिल्म शेष कथा में अभिनय किया, लेकिन यह फिल्म रिलीज नहीं हुई। इसके अगले साल इनकी फिल्म '7 नंबर क़ैदी' आई। इसके बाद 1955 में विमल रॉय की बांग्ला फिल्म 'देवदास' में पारो का किरदार निभाया।
बॉलीवुड में भी इन्होंने कई फिल्में कीं। इसमें से फिल्म 'आंधी' की खासी चर्चा रही। सुचित्रा सेन को 1972 में पद्मश्री सम्मान मिला। 2012 में इन्हें पश्चिम बंगाल सरकार के सर्वश्रेष्ठ अवार्ड बंग भूषण से सम्मानित किया गया।
सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और 'अग्निपरीक्षा', 'देवदास' तथा 'सात पाके बंधा' जैसी यादगार फिल्में कीं।
हिरणी जैसी आंखों वाली सुचित्रा 1970 के दशक के अंत में फिल्म जगत को छोड़कर एकांत जीवन जीने लगीं। उनकी तुलना अक्सर हॉलीवुड की ग्रेटा गाबरे से की जाती थी, जिन्होंने लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था।
कानन देवी के बाद बंगाली सिनेमा की कोई अन्य नायिका सुचित्रा की तरह प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाई। श्वेत-श्याम फिल्मों के युग में सुचित्रा के जबर्दस्त अभिनय ने उन्हें दर्शकों के दिलों की रानी बना दिया था। उनकी प्रसिद्धि का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं के चेहरे सुचित्रा के चेहरे की तरह बनाए जाते थे।
वर्ष 1966 की फिल्म 'बंबई का बाबू' में देवआनंद के साथ जोड़ी बनाई तो 1975 में रिलीज हुई फिल्म आंधी में वो संजीव कुमार के साथ दिखीं। गुलजार निर्देशित इस फिल्म के गाने बेहद मशहूर रहे। फिल्म में सुचित्रा का किरदार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीब होने की वजह से यह विवादों में भी रही। साल 1978 में बांग्ला फिल्म प्रनॉय पाशा के बाद उन्होंने अभिनय से संन्यास लेकर गुमनामी जिंदगी का दामन पकड़ लिया। वर्ष 2005 में उन्होंने प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने से भी इन्कार कर दिया क्योंकि वो लोगों के सामने नहीं आना चाहती थीं।
मृत्यु: 17 जनवरी 2014, कोलकाता
सुचित्रा का जन्म आज के बांग्लादेश के पाब्ना जिले में 1931 में हुआ था। इन्होंने 1952 में पहली फिल्म शेष कथा में अभिनय किया, लेकिन यह फिल्म रिलीज नहीं हुई। इसके अगले साल इनकी फिल्म '7 नंबर क़ैदी' आई। इसके बाद 1955 में विमल रॉय की बांग्ला फिल्म 'देवदास' में पारो का किरदार निभाया।
बॉलीवुड में भी इन्होंने कई फिल्में कीं। इसमें से फिल्म 'आंधी' की खासी चर्चा रही। सुचित्रा सेन को 1972 में पद्मश्री सम्मान मिला। 2012 में इन्हें पश्चिम बंगाल सरकार के सर्वश्रेष्ठ अवार्ड बंग भूषण से सम्मानित किया गया।
सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और 'अग्निपरीक्षा', 'देवदास' तथा 'सात पाके बंधा' जैसी यादगार फिल्में कीं।
हिरणी जैसी आंखों वाली सुचित्रा 1970 के दशक के अंत में फिल्म जगत को छोड़कर एकांत जीवन जीने लगीं। उनकी तुलना अक्सर हॉलीवुड की ग्रेटा गाबरे से की जाती थी, जिन्होंने लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था।
कानन देवी के बाद बंगाली सिनेमा की कोई अन्य नायिका सुचित्रा की तरह प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाई। श्वेत-श्याम फिल्मों के युग में सुचित्रा के जबर्दस्त अभिनय ने उन्हें दर्शकों के दिलों की रानी बना दिया था। उनकी प्रसिद्धि का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं के चेहरे सुचित्रा के चेहरे की तरह बनाए जाते थे।
वर्ष 1966 की फिल्म 'बंबई का बाबू' में देवआनंद के साथ जोड़ी बनाई तो 1975 में रिलीज हुई फिल्म आंधी में वो संजीव कुमार के साथ दिखीं। गुलजार निर्देशित इस फिल्म के गाने बेहद मशहूर रहे। फिल्म में सुचित्रा का किरदार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीब होने की वजह से यह विवादों में भी रही। साल 1978 में बांग्ला फिल्म प्रनॉय पाशा के बाद उन्होंने अभिनय से संन्यास लेकर गुमनामी जिंदगी का दामन पकड़ लिया। वर्ष 2005 में उन्होंने प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने से भी इन्कार कर दिया क्योंकि वो लोगों के सामने नहीं आना चाहती थीं।

Comments
Post a Comment